Monday, 3 November 2025

परजीवी बने रहते हैं आदमी..
महिलाओं का समय खा जाते हैं,
और शौक भी....l

Monday, 2 June 2025

तमाचा

कुछ साल पहले एक आदमी ने प्यार का झूठा खेल खेलने के बाद कहा था..
"मैं आदमी हूं मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा।" 
अभी फिर एक दूसरे ने कहा..
"हम आदमियों की जात ही ऐसी है.. एक से शादी 10 से चक्कर।"
क्या सच में इस निर्लज्जता, दुस्साहस और अहंकार का संबंध पुरुष होने से है...
या समाज के मुँह पर तमाचा है.. ये वक्तव्य...
उसकी दी गई खुली छूट के जवाब में....।

Friday, 7 February 2025

गायत्री

गायत्री सब जानती है..
फिर भी वह, वह स्त्री है..
जो पुरुष-सत्ता को पोसती है, सींचती है,
उसे फलने-फूलने में नींव का काम करती है..
और इस नींव पर खड़े पुरुष,
अहंकार और निर्लज्जता के साथ
दूसरी स्त्रियों के जीवन के साथ खेलते हैं..
गायत्री प्रतीक है उन स्त्रियों का..
जो पत्नी के रूप में पुरुष को प्रेम देती है,
उसकी हर तरीके से देखभाल करती है,
खेत, घर, गाय-भैंस सब संभालती है,
और आजकल तो नौकरी भी करती है...
जीवन-निर्माण की सभी खूबियां होने के बावजूद भी
अपने अय्याश पति को कुछ नहीं कहती है.. 
कोई मजबूत फैसला नहीं लेती है.. 
और गायत्री जैसी स्त्रियों की मूर्खता की कीमत, 
दूसरी मासूम स्त्रियों को चुकानी पड़ती है..
क्योंकि इन स्त्रियों से पोषित पुरुष
दूसरी स्त्रियों के जीवन को नोचते हैं...
क्या इसी दिन के लिए
ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने
महिलाओं को शिक्षित करने का फैसला लिया था..
कि शिक्षित और नौकरी-पेशा महिलाएं भी पुरुष-सत्ता को ही सींचती रहे?