कुछ साल पहले एक आदमी ने प्यार का झूठा खेल खेलने के बाद कहा था..
"मैं आदमी हूं मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा।"
अभी फिर एक दूसरे ने कहा..
"हम आदमियों की जात ही ऐसी है.. एक से शादी 10 से चक्कर।"
क्या सच में इस निर्लज्जता, दुस्साहस और अहंकार का संबंध पुरुष होने से है...
या समाज के मुँह पर तमाचा है.. ये वक्तव्य...
उसकी दी गई खुली छूट के जवाब में....।
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