Wednesday, 26 January 2022

वक्त के आईने में
दिख ही जाता है अक्स
अपने-परायों का......

औरतें अक्सर

कुदरत के हिसाब से जीते-जीते
पता ही नहीं चला
कब लाखों दुश्मन बना बैठी मैं
क्यूंकि उन लाखों समाज के ठकेदारों के
उस सभ्य ढांचे में फिट नहीं होती थी मैं..
अगर अपनी हर सांस का भी हिसाब मैं उन्हें देती
उनकी बनाईं हर जंजीर
हर बंधन को
मैं सर झुकाकर मान लेती
भूल जाती कि मुझमें भी सांसें चलती है..
जिंदगी धड़कती है..
और बन जाती उनके इशारों पर चलने वाली
रोबोट सरीखी-सी मशीन
तो सभ्य कहलाती मैं...
मगर विडम्बना कि कुदरत ही रह गई मैं....
और उस ढांचे के किसी काम की नहीं रही मैं
और बहुत देर से समझ पाई
कि औरत अगर एक लम्हा भी अपने लिए चाह लेती है 
तो स्वार्थी, खुदगर्ज और मतलबी समझी जाती है..
और जो हमेशा इस्तेमाल करते है हमारा हर रिश्ते में 
उस सभ्य समाज के लिए बेकार हो जाती है.. 
इसलिए चाहे बाहर से तन्हा रहे 
या फिर भीतर से 
मगर औरतें अक्सर
तन्हा ही रह जाती है...।

रास्तों की ख़ूबसूरती

तुम सबको दिखाने के लिए
कोई शानदार मंजिल नहीं है मेरे पास
शायद इसीलिए जीवन खाली लगे तुम्हें मेरा...
मगर मंजिल नहीं
रास्तों की ख़ूबसूरती को जिया है मैंने..
बाहर से भरी-भरी
जिंदगियों की रिक्तता को करीब से देखा है
और रीती-रीती जिंदगियों की पूर्णता को भी....।

Friday, 21 January 2022

रोड लाइट-सी लड़की

लगता है जैसे तू और मैं

एक ही लड़की के इश्क़ में है

जिसने खो दिया है

दुनिया की भीड़ में खुद को...

उससे फिर से मिलना चाहती हूं मैं 

और शायद तू भी... 

उस नटखट-सी

अपनों की परवाह करने वाली..

छोटी-छोटी चीजों में

खुशी ढूंढ लेने वाली लड़की से 

मेरी तरह.. तुझे भी इश्क़ है शायद...

मगर पता नहीं

उसकी मासूमियत

उसकी बेफ़िक्री  

फिर से लौट पाएंगी या नहीं...

वो सुनसान अंधेरे रास्तों पर

पथ-प्रदर्शक बनी

'रोड लाइट-सी लड़की'

हम दोनों को मिल पाएंगी या नहीं.. ।