Wednesday, 8 July 2020

तुम्हारे(अपरिपक्व) सवालों पर...

जवाब तो तुम्हारे हर एक सवाल का दे सकती हूं मैं
मगर क्या रखते हो तुम भी उसी स्तर की परिपक्वता
जिस स्तर की समझ के साथ देखा है मैंने जीवन को...
जिस खुले दिमाग से देखने के बाद
जाना है मैंने जिंदगी को..
समझा है उसके मायनों को..
शायद नहीं...
क्योंकि तुम तो अभी ये तक नहीं समझ पाए
कि मनुष्य जाति स्त्री और पुरूष दोनों के होने से है
मगर एक को तो कोख में भी जगह देने से एतराज है तुम्हें..
तो क्या समझोगे मायने तुम जीवन के....
तुम सब लकीर के फकीर जो ठहरे..
कुदरत ने हम सबको अपना अलग दिमाग दिया
मगर तुम कभी भी सम्मान कर पाए कुदरत का..
नहीं ना..
अगर भेड़ चाल ही होती जीवन के लिए सही
तो कुछ ही बंदों को ना दिया होता कुदरत ने दिमाग ?
मगर तुम हो कि जंग लगा उसे शान से बैठे हो..
इसलिए अक्सर खामोश रहती हूं मैं तुहारे सवालों पर...
क्योंकि..
"परिपक्व जवाबों को अपरिपक्व समझ के साथ, तुम पचा न सकोगे..."
क्योंकि अभी ना जाने और कितना वक्त लोगे तुम सब
जीवन को उसके मायनों के साथ स्वीकारने में....
इसलिए अक्सर खामोश रहती हूं मैं
तुम्हारे (अपरिपक्व) सवालों पर.......।

5 comments: