स्वयं से इतर
जिसे भी तुम
स्वयं से इतर ना देख पाओ
बस समझ लेना
वहीं प्रेम का पात्र है
तुम्हारे जीवन में..
और जो स्वयं से
इतर ना देख पाए तुम्हें
वहीं शख़्स
तुम्हारी तलाश..
तुम किसी के हो जाओ
अंतस के हर कोने से
परख लेना उससे पहले
कि सामने भी ऐसी ही चाह
है कि नहीं..
सफ़र लंबा हो जाए
किसी के साथ अगर
तो फिर वापस लौटना
थोड़ा मुश्किल हो जाता है..
यादों के दामन को छिटकना
और आगे बढ़ना
थोड़ा उलझन-भरा हो जाता है..
सुकूं की तलाश में निकलें हो
अच्छी बात है
झोली में कुछ कंकर
आ ही जाएंगे
चाहे जितना सम्हलकर चले हो..
मगर झोली
कंकरों से ही आबाद ना हो जाए
इसका ख्याल रखना..
जो स्वयं से इतर
ना देख पाए तुम्हें
उस शख़्स की तलाश
जारी रखना..।
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