Thursday, 19 May 2022

प्रकृति

फूलों के रंग
कहां फूलों तक रहते हैं..
बिखर जाते हैं
अपनी महक के साथ..
एक नजर ठहरकर 
दीदार कर लेने वाले के.. रुखसारों पर
महकते गुलाल की तरह......।

चांदनी आसमान में चांद की
सब तरफ फैली तो होती है..
मगर नहाता उसमें 
कोई-कोई शख़्स ही है.. 
रुककर दो पल सुकूं से निहारती है
जब कोई नजर चांद को..
तो साथ ही उतर आती है 
चांदनी भी भिगोने उसे..
और जब चांदनी में भीगकर 
चहकती है कोई रुह तो..
उस पल खिल उठता होगा चांद भी...
जैसे पानी में भीगते-चहकते 
अपने बच्चे को देखकर
खिल उठती है..कोई मां.....।

पत्तों से बिखरकर 
यूं तो हरियाली कहीं नहीं जाती..
मगर दिन-रात की दौड़ती-भागती जिंदगी 
ज्यों ही ठहर जाती है..
पेड़ों की लहराती शाखों के
मचलते पत्तों पर..
तो आंखों से‌ होकर हरियाली
दिल के मैदानों तक दौड़ जाती है...

No comments:

Post a Comment