Saturday, 16 April 2022

संग्राम

जीवन के मायने

वो लोग ज्यादा बेहतर समझते हैं

जो कर आए है आंखें चार मौत से..

दे आए है मात मौत को

थामने जिंदगी का दामन..

सही कहा है किसी ने...

कि "युद्ध से योद्धा वैसे कभी नहीं लौटते.. 

जैसे कि वो गए थे।"

संग्राम चाहे जीवन का हो या राष्ट्रों का

भीतर कुछ बदल ही जाता है....।


Monday, 11 April 2022

क्षमा वीरस्य भूषणम्

क्षमा वीरों का आभूषण है

मगर ये क्षमा.. किसी और के लिए नहीं

बल्कि हमारे ही लिए होती है..

क्योंकि जब हम माफ कर पाते हैं 

तब हम शांत हो जाते हैं ...

जब नहीं कर पाते 

तब बेहद बेचैन

और विध्वंसक हो जाते हैं....

जीवन कुछ रच सकें

जीवन को उसके वास्तविक अर्थों में हम जी सकें

इसके लिए जरूरी है 

हमारे पास विध्वंसक नहीं 

रचनात्मक ऊर्जा हो....।


Tuesday, 5 April 2022

स्वीकारना जो सीख लेते हो

कितना कम है

जीवन में चुनने के लिए..

और कितना अधिक है

जीने के लिए...

चुनने की स्वतंत्रता

हमें हर बार नहीं होती

लेकिन जीने की होती है...

क्योंकि समझ लो जीवन को

तो टकराना छोड़ देते हो...

जीवन को उसके सहज भाव से

स्वीकारना जो सीख लेते हो...।




Sunday, 20 March 2022

नीम

तुम्हारी शाखाओं को काटा गया

नहीं..

तुम्हें जड़ से नष्ट किया गया...

बिछा दी गई टाइल्स

मंदिर के हर कोने में

मंदिर को भव्य बनाने के लिए...

उस रोज तुम्हारी ही छांव तले

करने को फैसला तुम्हारा

कुछ प्रबुद्ध जन बैठे थे...

और फैसला

तुम्हारे विपक्ष में आया था.....।














Monday, 7 March 2022

राहों का चुनाव

कभी कभी हम नहीं 
राहें हमें चुनती हैं...
जैसें चुना था एक रोज़ उन्होंने
गौतम को...
और बना दिया था 'बुद्ध'
'महात्मा बुद्ध'...........।

Monday, 7 February 2022

अम्मू 

ओ मेरे प्यारे अमरूद के पेड़
जब से होश संभाला
तुम्हारी छाया में रही
तेरी डालियों पर झूली..
मां जब चूल्हे पर रोटी बनाया करती थी
और वहीं पास बैठकर जब हम‌ खाना खाया करते थे
तब तेरी डालियों पर बैठी नन्हीं चिड़ियों का
डाल से उतर कर हमारे पास आ जाना
हमारा उन्हें रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े डालना 
और फिर से उनका तेरे दामन में सुकूं से जाकर बैठ जाना
सब हमारे सुनहरे बचपन की तस्वीरें है....

साफ-साफ याद है मुझे स्कूल के वो दिन
जब स्कूल से लौटते ही खिड़की में बस्ता रख 
हम सीधे तेरी डालियों पर चढ़ जाया करते थे 
और जब तक दो-चार अमरुद अंदर नहीं जाते
हम खाना तक नहीं खाते थे..

ठंडी हवाओं के साथ 
तेरी डालियों को पकड़कर 
जब झूमा करते थे 
तब भीतर का संगीत भी स्वत: ही फूट पड़ता था..
तेरे इर्द-गिर्द हंसते-गाते, वक्त कैसे गुजर जाता था 
पता ही नहीं चलता था...

मोहल्ले के हर घर की जीभ तक पहुंच थी तुम्हारी
और अड़ोस-पड़ोस के बच्चों के बचपन में तो
तुम आखिर तक रंग भरते रहे...

गर्मियों की उन शीतल रातों में
जब बाहर बिस्तर लगाकर सोया करते थे
तब तेरी पत्तियों की ओट से झांकते
चांद-तारों की वो रूमानियत-भरी महक
दिलों-दिमाग पर आज तक कब्जा किए हुए है...

तेरी शाखाएं न जाने कितने पक्षियों का रैन बसेरा रही
वो नन्हीं बया जिसने अपना घोंसला 
बहुत नीचे की डाल पर बना लिया था..
वहां से गुजरते वक्त कभी-कभी गलती से 
जब हम उसके घोंसले से टकरा जाया करते थे
तब वह बड़ी मासूमियत से देखा करती थी हमें
जैसे कह रही हो..मैं भी रहती हूं यहां..
जरा देख कर चला करो..
मगर कभी घोंसले से उड़ कर नहीं गई
शायद भरोसा था सुरक्षित है वो यहां..
टेलरबर्ड का घोंसला भी तो
पहली बार तुम्हारी ही डालियों पर देखा था और आखिरी बार भी...

बया का वो नन्हा-सा बच्चा याद है मुझे
जो तेरी ही डालियों पर बड़ा हुआ 
जब उसने उड़ना सीखा 
और छोड़कर घोंसले को खुले आसमां को नापने निकल गया था..
फिर भी महीने-भर तक रोज दोपहर
घंटे-भर का समय..रोज तेरी डालियों पर बिताने आया करता
शायद फिर से अपने बचपन को जीने आया करता था..

तुम सिर्फ एक पेड़ नहीं थे हमारे लिए
एक 'जीवंत व्यक्तित्व' थे..
जिसके इर्द-गिर्द हम बच्चे से बड़े हुए
पक्षियों के मनोविज्ञान को समझा
जीवन को समझा..
तुम और तुम्हारी यादें 
किसी अपने की तरह 
जिंदगी को आज भी सुकूं से आबाद करती है...।


Wednesday, 26 January 2022

वक्त के आईने में
दिख ही जाता है अक्स
अपने-परायों का......