Sunday, 31 May 2020

बीमारी...

ठहरा दिया जाता है अक्सर दोषी,
अपने साथ घटे हादसें के लिए
उसी स्त्री को,
भोगी है जिसने नर्क-सी यातना,
देखा है जिसने अपनी ही आंखों सें,
नोंचते हुए अपने जिस्म को भेड़ियों द्वारा।

रुह काँप जाती है
जिस दरिंदगी की दास्तां सुन कर ही,
ठहरा दी जाती है दोषी
उस दरिंदगी के लिए,
वही स्त्री, उसका पहनावा
और उसका चालचलन।

चलो एक बार की मान लेते है,
कि किसी स्त्री के शरीर पर पहने गये कपड़ें,
उसका चालचलन, निमंत्रण देते है
किसी पुरुष को बलात्कार के लिए,
तो शायद दिया होगा
कुछ ऐसा ही आमंत्रण,
6 माह की दुधमुंही बच्ची ने भी।

शायद किया होगा कुछ इसी तरह आमंत्रित
बलात्कारियों को,
60-70 साल की बुजुर्ग महिला ने भी,
अपने पहनावें, अपनें चालचलन से।

तभी तो ना ख्याल किया गया
मासूम बचपन का,
और ना मां समान अधेड़ उम्र की,
औरत के बुढ़ापे का।

बीमारी कहीं और होती है
और इलाज कहीं और ही चलता रहता है,
यही तो करते है हम,
हर बार औरतों को
इन हादसों के लिए जिम्मेदार ठहरा कर,
हर बार उन्हें ही नसीहतें देकर,
तो फिर बीमारी के ठीक होने की उम्मीद बेमानी हैं..।

                                   

Wednesday, 27 May 2020

जीना भी एक कला है....
कि बस जिया जाये इसें..'अनगढ़' तरीके से....।

Tuesday, 26 May 2020

मैं भी रूह...तू भी रूह...

मैं भी रूह...
तू भी रूह...
औरत और मर्द तो
ये ज़िस्म हुए....
मगर ना जाने क्यूं ,
ढूंढकर ज़िस्म पर
औरत के निशां...
एक रूह,
दूजी रूह के
दर्द की वजह हुए....
मैं भी रूह...
तू भी रूह...
औरत और मर्द तो
ये ज़िस्म हुए....।
                       
                                   

Sunday, 24 May 2020

दुनिया अलग-अलग यहां सबकी..

जीवन एक,
अंतिम सत्य भी एक ही..
मगर जीवन-पथ अलग-अलग सबका..।

यात्रा अलग,
और रास्तें..
अलग-अलग सबके।

सपनें अलग,
और उन्हें पाने की..
दौड़ अलग-अलग सबकी।

अनुभव अलग,
और अनुभूतियां..
अलग-अलग सबकी।

संसार एक ही,
मगर दुनिया..
अलग-अलग यहां सबकी......।

Saturday, 23 May 2020

आत्महत्या (सामाजिक-हत्या)

'आत्महत्या' क्षणिक आवेग नहीं
घुटन है, एक लम्बे-चौडे़ वक्त की..
कोशिश है, सामने खडी़
बद्शक्ल जिंदगी से आजादी की..।

कहानी है शायद उस वक्त की
जब स्वीकार नहीं पाता होगा कोई शख़्स
सामने खडी़ उस बद्सूरत जिंदगी को
जिसकी खूबसूरती के सपनें उसने सजाये थे..।

उठ जाता होगा विश्वास ,
जब हर रिश्तें से...
छूट जाता होगा मोह,
जब अपने से जुडे़ हर शख़्स से...
और जब नजर आता होगा हर तरफ
सिर्फ अँधेरा,
अविश्वास,
नफरत,
धोखें और चालबाजियाँ
और मुश्किल हो जाता होगा जब
इन सबसे उपजी घुटन और दर्द को बर्दाश्त कर पाना..
और जब लाख कोशिशों के बाद भी
नजर ना आती होगी एक किरण रोशनी की..
शायद तभी, खुद की दर्द से तड़पती
रूह के सुकूं के लिए
खुद और दुनिया से बेहद प्रेम करने वाला एक शख़्स,
चुन लेता होगा वो राह..
दुनिया जिसे,
'आत्महत्या' कहती है........

ना जाने कितने हाथ रंगें होंगे
उस एक मासूम के खून में..
मगर कठघरे में खडा़.. सिर्फ वही मिलेगा......।

                                   

Friday, 22 May 2020

आसां नहीं होता....
मुर्दों के शहर में.. जिंदा होना....।

Thursday, 21 May 2020

अनगिनत कहानियां..

ना राधा ने,
ना मीरां ने,
ना सीता ना,
और ना ही द्रौपदी ने,
स्वयं चुनी थी अपनी तबाहियां... 
वैसे ही अनवरत जारी है, आज भी..
स्त्री के जीवन में..
तबाहियों की अनगिनत कहानियां....।

Wednesday, 20 May 2020

एक अदद इश्क़ और तुम...
दोनों ही जाहिल निकले....
उस दोगले समाज को दुर्गा अष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं .....जो अभिनय तो स्त्री को देवी मानने का करता है और ..... जिसके‌ लगभग ‌हर घर, हर गली, हर बस्ती, हर चौराहे पर..... गूंजता रहता है दम्भ से भरा बस एक ही स्वर.... मैं पुरुष हूं..... मैं पुरुष हूं........

तेजाब

तेजाब सिर्फ, जिस्म़ को नही गलाता
गल जाती है संग उसके, उस शख्स की रुह भी..
चेहरे से गलके, टपकते माँस संग
टपक जाता है, उसके मन का विश्वास भी।

तेजाब सिर्फ, जिस्म़ को नही गलाता
गल जाते है संग उसके, उस शख्स के सपने भी..
चेहरे से गलके, टपकते माँस संग
टपक जाता है, हर किसी का इंसानियत से विश्वास भी।

तेजाब सिर्फ, जिस्म़ को नही गलाता
गल जाती है संग उसके, उस शख्स की जिंदगी भी
चेहरे से गलके, टपकते माँस संग
टपक जाते है, हमारे सभ्य होने के सभी दावे भी।
                             
                                       

Tuesday, 19 May 2020

इस रूह को...

पहली बार सुनी हो
जैसे किसी झरने की कलकल..
और कानों ने कुछ अमृत-सा पी लिया हो..
तुम्हारी आवाज इन कानों में..
हर बार जैसे..
कुछ ऐसे ही घुली हो....।

ढ़लते सूरज और उसकी लालिमा को
बस जैसे देखते ही रहते है हम
उसके छिप जाने तक..
वैसे ही एक-टक..
ओझल ना होने तक..
देखा है मैंने.. तेरे अक्स को...।

बारिश की बूंदें
अगर भिगोती सिर्फ इस तन को
तो किसको याद रहती वो भला..
मगर उनकी ही तरह
भिगोता रहा है..
तू भी.. इस रूह को....।


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Monday, 18 May 2020

वहशीयत...

तराजू के किन्हीं
दो पलड़ों की तरह...
रखी होती हैं
एक तरफ,
किसी की पूरी जिंदगी...
और दूसरी तरफ,
तुम्हारा दो पल का मजा...
और चुन लेते हो तुम,
वो वहशीयत- भरा
दो पल का मजा...
और गिरा देते हो..
'जिंदगी की कीमत।'
(RIP अरुणा शानबाग को समर्पित)

Thursday, 14 May 2020

याद रखना...

जिंदगी के सफ़र में
क़दम क़दम पर अलग-अलग फितरत
और नीयत के लोग मिलेंगे....
तुम चाहो या ना चाहो
वो हर रोज़ मिलेंगे...
तो तू आदत बना ले अपनी
अपने हर द्वंद्व.. हर डर..हर बैचेनी..के चौराहें से
हर बार अदम्य जिजीविषा को चुनने की... ।

मित्र के वेश में शत्रु हर राह पर मिलेंगे
मगर याद रखना..
अगर छोड़ दी तुमने.. खुद से यारी
तो शत्रु अपने सबसे बड़े तुम स्वयं ही बन बैठोगे...
तो याद रखना..
कि तुम ही सर्वश्रेष्ठ मित्र हो सकते हो खुद के
और मित्र की ही भांति सर्वश्रेष्ठ आलोचक भी...
तुम ही सबसे पहले
डरा कर चुप बिठा सकते हो खुद को
और तुम ही सबसे पहले
खड़े कर सकते हो खुद को.. साहस के साथ..।

अपने से प्रेम करना जिस दिन तुमने छोड़ दिया
किसी और से प्रेम पाने की उम्मीद, फिर ना करना..
याद रखना..
जिंदगी की किसी भी जिम्मेदारी से बड़ी है
तुम पर स्वयं की ही जिम्मेदारी...
तो हाथ सबसे पहले अपना ही थामना
ताकि फिर जिसका भी हाथ तुम थामों
वो भर उठे गर्व से.. तुम्हारे साथ से...।

नज़रें अपनी हमेशा अपनी फख्र से उठाना..
दुनिया की नजरों से.. खुद को कभी ना तोलना
वरना फिर कभी खुद को प्रेम न कर सकोगे...
अपने होने पर फ़ख्र न कर सकोगे...
दुनिया के बेहतरीन शख़्स से
फिर कभी न मिल सकोगे...
याद रखना..
ये सिर्फ़ तुम्हारी हानि न होगी..
संपूर्ण मानवता.. पूरी दुनिया को ये क्षति सौंप दोंगे तुम...
तो याद रखना...
खुद से प्रेम करना.. स्वयं के मित्र, स्वयं के आलोचक होना..
खुद की जिम्मेदारी लेना..
खुद को साहस से सींचना..
और खुद पर फ़ख्र करना..हर हाल में..
तो याद रखना......।                                               
                                                   

Sunday, 10 May 2020

देर से ही सही...

देर से ही सही..
मगर अब जीना मैंने सीख लिया है....
जब जहां हूं मैं..
उसी पल.. उसी लम्हें में..
अब रहना मैंने सीख लिया है....
बहुत हो चुका भागना..
अतीत तो कभी.. भविष्य की गलियों में..
जीवन तो इसी पल.. इसी लम्हें में.. घटित होता है..
देर से ही सही..
मगर इस सत्य को मैंने जान लिया है....
जानना ही काफी नहीं होता है..
ये भी सही है..
जानकर.. खुद को रोक पाना वर्तमान में..
ये ही तो सबसे अहम होता है....
मगर जीना वर्तमान में..
बना सकते है आदत हम अपनी..
जानकर इसे.. आदत अपनी बना लिया है....
देर से ही सही..
मगर अपनी हर सांस को..
अब जीना मैंने सीख लिया है........।

                                            

Thursday, 7 May 2020

नि:शब्द...

नि:शब्द तुम..
नि:शब्द हम..
संवाद जारी है मगर....
राग सारे प्रेम के
छू रहे हैं अंतर्मन..
इक कश्ती पर सवार
बहे जा रहे है
रुख हवाओं के देखते से..
नि:शब्द तुम..
नि:शब्द हम..
संवाद जारी है मगर....।


Wednesday, 6 May 2020

जिंदगी इन्द्रधनुष-सी हो जाए.. फिर से....

जिंदगी इन्द्रधनुष-सी हो जाए.. फिर से..
कि उड़े हवाओं में गुलाल फिर से...

बनके छुक-छुक रेल के डिब्बें,
दौड़ पड़े मैदानों में बच्चें फिर से..

ढूंढ़कर पेड़ों की सबसे मजबूत डालियां,
डाले जाए आंगन में झूलें फिर से..

मिल बैठे जब यारों के टोलें,
गूंज उठे ठहाकों से उनके चहूं दिशाएं फिर से..

घर की चौखट पर जो मेहमान आए,
दिल खोलकर की जाए मनुहार फिर से..

छुअन की वो मीठी-सी बोली,
पड़े हृदय के कानों में फिर से..

जिंदगी इन्द्रधनुष-सी हो जाए.. फिर से..
कि उड़े हवाओं में गुलाल फिर से......।




Monday, 4 May 2020

तू वो शख़्स रहा है जिंदगी में..
जिसकी तमन्ना में एक उम्र गुजारी जा सके..।

तुम ही बता दो..


हर रोज़ अपनी नज़रों से
चुपके-से..
मेरी नजर उतारना तेरा....
हर बार...
तेरे मासूम से चेहरे का
मुड़ जाना मेरी तरफ
सूरजमुखी की तरहा.....
कैसे भूलूं.. तुम ही बता दो.....।

खनखनाती-सी तुम्हारी आवाज
जिसे सुनने को 
दिल हमेशा ही प्यासा बैठा हो...
रूह का हर कोना
जगमग कर जाती थी जो
वो जुगनुओं-सी
चमकती तुम्हारी आंखें..
कैसे भूलूं.. तुम ही बता दो.....।

ज्यादा तो नहीं जानती
इश्क़ के बारे में
मगर तेरे साथ से
जो सुकूं रहा है जिंदगी में...
उस सुकूं और
धड़कती हुई जिंदगी को..
कैसे भूलूं.. तुम ही बता दो.....।

Sunday, 3 May 2020

इन दिनों (Lockdown)

जीवन की क्षणभंगुरता से
परिचय हो रहा है.. हर किसी का..
इन दिनों.....
घुटन भी खुद गुफ्तगू करती है
बैठकर सबसे..
इन दिनों.....
जायज़-सी लगती थी
जो रवानगी सांसों की..
कैद है वो चारदीवारी में..
इन दिनों.....
रखती है मगर आज भी..
उम्मीद और कोशिशें..
पहले-सा ही रुतबा अपना..
इन दिनों........।