मैं भी रूह...
तू भी रूह...
औरत और मर्द तो
ये ज़िस्म हुए....
मगर ना जाने क्यूं ,
ढूंढकर ज़िस्म पर
औरत के निशां...
एक रूह,
दूजी रूह के
दर्द की वजह हुए....
मैं भी रूह...
तू भी रूह...
औरत और मर्द तो
ये ज़िस्म हुए....।
तू भी रूह...
औरत और मर्द तो
ये ज़िस्म हुए....
मगर ना जाने क्यूं ,
ढूंढकर ज़िस्म पर
औरत के निशां...
एक रूह,
दूजी रूह के
दर्द की वजह हुए....
मैं भी रूह...
तू भी रूह...
औरत और मर्द तो
ये ज़िस्म हुए....।
Nice,
ReplyDeleteBeautiful kavita
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