Wednesday, 6 May 2020

जिंदगी इन्द्रधनुष-सी हो जाए.. फिर से....

जिंदगी इन्द्रधनुष-सी हो जाए.. फिर से..
कि उड़े हवाओं में गुलाल फिर से...

बनके छुक-छुक रेल के डिब्बें,
दौड़ पड़े मैदानों में बच्चें फिर से..

ढूंढ़कर पेड़ों की सबसे मजबूत डालियां,
डाले जाए आंगन में झूलें फिर से..

मिल बैठे जब यारों के टोलें,
गूंज उठे ठहाकों से उनके चहूं दिशाएं फिर से..

घर की चौखट पर जो मेहमान आए,
दिल खोलकर की जाए मनुहार फिर से..

छुअन की वो मीठी-सी बोली,
पड़े हृदय के कानों में फिर से..

जिंदगी इन्द्रधनुष-सी हो जाए.. फिर से..
कि उड़े हवाओं में गुलाल फिर से......।




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