Sunday, 31 May 2020

बीमारी...

ठहरा दिया जाता है अक्सर दोषी,
अपने साथ घटे हादसें के लिए
उसी स्त्री को,
भोगी है जिसने नर्क-सी यातना,
देखा है जिसने अपनी ही आंखों सें,
नोंचते हुए अपने जिस्म को भेड़ियों द्वारा।

रुह काँप जाती है
जिस दरिंदगी की दास्तां सुन कर ही,
ठहरा दी जाती है दोषी
उस दरिंदगी के लिए,
वही स्त्री, उसका पहनावा
और उसका चालचलन।

चलो एक बार की मान लेते है,
कि किसी स्त्री के शरीर पर पहने गये कपड़ें,
उसका चालचलन, निमंत्रण देते है
किसी पुरुष को बलात्कार के लिए,
तो शायद दिया होगा
कुछ ऐसा ही आमंत्रण,
6 माह की दुधमुंही बच्ची ने भी।

शायद किया होगा कुछ इसी तरह आमंत्रित
बलात्कारियों को,
60-70 साल की बुजुर्ग महिला ने भी,
अपने पहनावें, अपनें चालचलन से।

तभी तो ना ख्याल किया गया
मासूम बचपन का,
और ना मां समान अधेड़ उम्र की,
औरत के बुढ़ापे का।

बीमारी कहीं और होती है
और इलाज कहीं और ही चलता रहता है,
यही तो करते है हम,
हर बार औरतों को
इन हादसों के लिए जिम्मेदार ठहरा कर,
हर बार उन्हें ही नसीहतें देकर,
तो फिर बीमारी के ठीक होने की उम्मीद बेमानी हैं..।

                                   

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