Wednesday, 10 June 2020

जिंदगी और हमारा सामाजिक ढांचा

हमारी ज़िंदगी हमारे चुनावों पर निर्भर करती हैं
और हमारे चुनाव,
हमारे सामर्थ्य पर...
हमारा सामर्थ्य हमारी परवरिश पर
और हमारी परवरिश,
हमारे सामाजिक ढांचें पर...
और हमारा सामाजिक ढांचा.......
मनोवैज्ञानिक रूप से इस कदर समृद्ध
जो देता है आधी आबादी को तो इतनी आज़ादी
कि वो उच्छृंखल हो जाये,
और आधी का.. इतना दमन
कि वो कुंठित हो जाये...
और जीवन ना तो उच्छृंखल में घटता है, ना कुंठित में
क्योंकि उच्छृंखलता सिर्फ विध्वंस मचाती है
और विध्वंस और जीवन तो इक- दूजे के विलोम ठहरे..
कुंठित में तो जीवन का सवाल ही कहां ?
तो फिर हमारे.. इस सभ्य सामाजिक ढांचे में
आखिर जीवन घटता कहां है?
                                 
                                      

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