Sunday, 14 June 2020



मनोविज्ञान कहता है कि "प्रत्येक आत्महत्या 'सामाजिक- हत्या' होती है... ये किसी भी समाज की भीतरी सड़न और खोखलेपन की और साफ-साफ इशारा करती है...।"
इस तरह आत्महत्या जैसें किसी शब्द का कोई अस्तित्व ही नहीं है...ये तो बस एक निर्दोष और दुनिया से जा चुके इंसान को कठघरे में खड़ा करके.. हम सबका खुद को बरी कर लेने को इज़ाद किया गया एक झूठा शब्द-भर है....( RIP सुशांत सिंह राजपूत को समर्पित)

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