दो लोगों के भीतर
जो प्रेम स्वत: उत्पन होता है..
उस जायज़ प्रेम को
नाजायज़ ठहरा देते है हम...
और दूसरी तरफ....
मजबूर कर देते है दो अजनबियों को
जबरदस्ती एक दूसरे के प्रति
झूठा प्रेम प्रदर्शित करने को..
और ये जायज़....
नाजायज़ को जायज़
और जायज़ को नाजायज़
ठहराते आ रहे है हम..सदियों से....।
क्या खूब लिखा है, तलवार भी नहीं चलाई और मार भी डाला।
ReplyDeleteThanku...
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