बंटा पड़ा है सम्पूर्ण विश्व,
स्त्री-पुरुष के खेमों में..
और पीछे,
कहीं बहुत पीछे......
छूट गए वो साथी,
गढ़ा था कुदरत ने जिन्हें....
एक-दूजे के सुकूं,
एक-दूजे के साथ के लिए....।
और पीछे,
कहीं बहुत पीछे......
छूट गए वो साथी,
गढ़ा था कुदरत ने जिन्हें....
एक-दूजे के सुकूं,
एक-दूजे के साथ के लिए....।
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