छूकर कोई मुझे
मुझसे ही दूर कर रहा है..
मेरे बचपन
मेरी मासूमियत को ही नहीं...
मेरे बचपन
मेरी मासूमियत को ही नहीं...
मेरे पूरे जीवन-उत्सव को ही कोई
बहुत वीरान कर रहा है.....
बहुत वीरान कर रहा है.....
तुम सब को फुर्सत नहीं शायद
ये देखने या समझने की..
कि कोई बच्चा क्यूं
कि कोई बच्चा क्यूं
आज-कल गुमसुम हो रहा है...
शायद व्यस्त रहते हो तुम
किन्हीं ज्यादा ज़रूरी बातों में...
किन्हीं ज्यादा ज़रूरी बातों में...
कि किसकी बहू ने घूंघट किया
और किसकी ने नहीं..
या इतने नादान हो
और किसकी ने नहीं..
या इतने नादान हो
कि दिखती ही नहीं उदासी
किसी मासूम की..
या इतने लापरवाह
कि फर्क ही नहीं पड़ता
किसी मासूम जिंदगी से...
या फिर समझते ही नहीं तुम
हमारे लिए अपनी कोई भी जिम्मेदारी...
शायद इसीलिए.. हर रोज कहीं ना कहीं
छूकर कोई मुझे
मुझसे ही दूर कर रहा है.....
किसी मासूम की..
या इतने लापरवाह
कि फर्क ही नहीं पड़ता
किसी मासूम जिंदगी से...
या फिर समझते ही नहीं तुम
हमारे लिए अपनी कोई भी जिम्मेदारी...
शायद इसीलिए.. हर रोज कहीं ना कहीं
छूकर कोई मुझे
मुझसे ही दूर कर रहा है.....
मेरे बचपन
मेरी मासूमियत को ही नहीं...
मेरी मासूमियत को ही नहीं...
मेरे पूरे जीवन-उत्सव को ही कोई
बहुत वीरान कर रहा है.....।
बहुत वीरान कर रहा है.....।
Deep
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