रत्ती-भर भी फर्क नहीं पड़ता
'रिश्तों की दुनिया' में.. इस बात से....
कि उन्हें संवारनें.. उन्हें सम्भालनें..
या उन्हें बचाने के लिए
आप कहां तक गये....
आपने खुद को कहां तक झोंक दिया....
गर वाकई फर्क पड़ता है
यहां किसी बात से..
तो वो बस इतनी-सी है...
कि सामने वाले ने क्या सीखा था...
'कृतज्ञ' होना..
या फिर 'कृतघ्न'........।
'रिश्तों की दुनिया' में.. इस बात से....
कि उन्हें संवारनें.. उन्हें सम्भालनें..
या उन्हें बचाने के लिए
आप कहां तक गये....
आपने खुद को कहां तक झोंक दिया....
गर वाकई फर्क पड़ता है
यहां किसी बात से..
तो वो बस इतनी-सी है...
कि सामने वाले ने क्या सीखा था...
'कृतज्ञ' होना..
या फिर 'कृतघ्न'........।
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